

पोरवाल समाज का इतिहास - पृष्ट भूमि एवं उत्कर्ष
तीर्थकर परमात्मा महावीर स्वामी के पूर्व से ही भारत भूमि पर जैन धर्म का बीजा रोपण हो चुका था| महावीर स्वामी के पश्चात इस में गति तो आयी परन्तु विक्रम संवत् की सातवी शताब्दी तक जैन धर्म व्यक्ति गत धर्म ही रहा | इसके मानने वाले व इसे पालने वाले अपने तक ही सीमित थे | इनके वंशज जैन धर्म के सिद्धान्तों, व्रतो, नियमो आदि को मानने के लिये प्रतिबद्ध नही थे | वि. स. ७०४ में श्रीमद शान्ति सूरी द्वारा प्रति बोधित श्रीमाल पुर ( वर्तमान भीनमाल ) के श्रावक डोडा ने नवहर में आदिनाथ चैत्य का निर्माण करवाया | वि. स. ७५० के आसपास ही श्रीमाल पुर में विद्याधर कुल के श्रीमद स्वयं प्रभ सूरी का आगमन हुआ | इन्होने यज्ञ हवन एवं पाखण्ड पूर्ण क्रियाओ का उन्मूलन कर महावीर स्वामी के अहिंसा धर्म का सर्वत्र प्रचार एवं प्रसार करना अपना मुख्य उद्देश्य बना लिया था | श्री मद स्वयं प्रभ सूरी ने वैश्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उत्तम संस्कारी कुलो के लोगो को सर्व प्रथम जैन बनाया | ये ही लोग प्राग्वाट कहलाये | अरावली प्रदेश की पाटनगरी पद्मावती में भी इन्ही आचार्य श्री ने विभिन्न संस्कारी जातियो को जैन धर्म की दीक्षा दी व इसे भी प्राग्वाट समाज से जोड दिया | वर्तमान सिरोही, पालन पुर राज्य का उत्तर पश्चिम भाग, गोडवाड ( गिरी - प्रांत ) प्राग्वाट प्रदेश कहलाता था अतः वहाँ बसने वाले नव दीक्षित जैन प्राग्वाट जाने जाते थे | कालान्तर में यही प्राग्वाट समाज पोरवाल जैन जाति के नाम से प्रसिद्ध हुआ |
वर्तमान पोरवाल समाज
पोरवाल एवं ओसवाल दोनो जैन सम्प्रदायों का उत्पति स्थान राजस्थान ही है| प्राग्वाट, पुरवाट, पोरवाड एवं पोरवाल शब्दो के अर्थ एक ही है, सिर्फ बोलचाल के भेद से शब्द परिष्कृत होता चला गया है |
जैन जिनालयों के शिलालेखो, ताम्रपजो, चारण एवं भट्ट कवियों द्वारा निर्मित वंशावलियो, जैनाचार्यो व प्रबुध्द श्रावको द्वारा लिखित हस्त प्रति लिपियो आदि से यह बात प्रमाणित होती है कि जैनाचार्यो से, प्रतिबोध पाकर प्राग्वाट कहलाने एवं प्राग्वाट समाज में गोत्रो की स्थापना का समय विक्रम संवत की आठवी सदी के मध्य का ही है|
प्राग्वाट समाज की कुलदेवी अंबिका देवी है | आठवी सदी से तेहरवी शताब्दी तक का समय प्राग्वाट अथवा पोरवाल समाज के सर्वमुखी उत्कर्ष का स्वर्ण काल रहा है | वैश्य वर्ग एवं अन्य कुलीन संस्कारी जातियो से जैन धर्म में दीक्षित होने के कारण प्राग्वार श्रावक वर्ग शुरु से व्यापार प्रधान एवं समृद्ध रहा है|
कालान्तर से जैनाचार्यो, मुनियो एवं प्रबुद्ध श्रावको के प्रयासो से भगवान महावीर के शासान का जैन समाज एवं उसके महत्वपूर्ण अंग प्राग्वाट समाज के निर्माण एवं विकास का यह स्तुत्य क्रम उत्तरोत्तर चलता रहा| इस तरह वर्तमान गौरवशाली पोरवाल समाज का उदय हुआ|
जावडशाह, वस्तुपाल, तेजपाल, विमलशाह, धरणाशाह आदि इतिहास पुरुषो ने इसी प्राग्वाट अथवा पोरवाल समाज के इतिहास को स्वर्णाक्षरो में अंकित किया |
वर्तमान में पोरवाल समाज के पास जो मान, प्रतिष्ठा, कीर्ति, वैभव एवं समृद्ध है उसका श्रेय हमारे जैनचार्यो के साथ साथ हमारे पूर्वजों को जाता है | उन्हीं के उपदेश, मेहनत आशीर्वाद एवं मातृभूमि से प्रेम के कारण ही आज हम इस स्थान तक पहुँचे है | पोरवाल समाज आज भले ही भारतवर्ष एवं उसके बाहर पूरी दुनिया में बिखरा हुआ है फिर भी अपनी मातृभूमि राजस्थान से प्रेम एवं रिश्ता बनाये हुये हैं | राजस्थान के तीन जिलो पाली, जालोर एवं सिरोही में पोरवाल बंधुओं की बहुतायत है और यही गौरव शाली समाज मुंबई एवं दक्षिण भारत को अपनी कर्म भूमि बना कर अपनी वैभवशाली परम्परा निभा रहा है|
साभार
उपरोक्त लेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक तथ्य श्री दौलत सिह जी लोढा द्वारा लिखित " प्राग्वाट इतिहास " १९५३ से लिये गये है |
